ब्रह्माण्ड के बनने से लेकर अब तक का सफर -universe meaning in hindi

ब्रह्माण्ड के बनने से लेकर अब तक का सफर -universe meaning in hindi
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ब्रह्मांड क्या है ? (Universe meaning in hindi )

पृथ्वी को घेरने वाली अपार आकाश तथा उसमें उपस्थित सभी खगोलीय पिंड (जैसे-मंदाकिनी, तारे, ग्रह, उपग्रह आदि) एवं सम्पूर्ण ऊर्जा को ब्रह्मांड (Universe meaning in hindi) कहते
हैं । ब्रह्मांड इतना विशाल है, जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकते। इसके आकार की विशालता, इसमें तारों की संख्या अपार दूरी तथा द्रव्यामान का अनुमान लगाना कठिन है। फिर भी, बड़े परिमाण की संख्याओं के सहारे इनका अनुमान लगाने की कोशिश की जाती है। खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार ब्रह्मांड में सैकड़ों अरब मंदाकिनी (galaxies )हैं तथा प्रत्येक मंदाकिनी( galaxies ) में लगभग एक सौ अरब तारे हैं। इस प्रकार तारों की कुल संख्या 10^22 कोटि की होगी।

ब्रह्मांड की उत्पत्ति (Eolutionon of the universe)

ब्रह्मांड के प्रारंभ तथा इसके भविष्य के प्रश्न को लेकर अनेक सिद्धान्त व्यक्त किए गए हैं। उन सभी सिद्धान्तों में बिग बैंग सिद्धान्त (Big Bang Theory) को सर्वाधिक मान्यता प्राप्त हुई । यह सिद्धान्त उस समय प्रतिपादित किया गया जब खगोल विज्ञानियों ने विकसित टेलिस्कोप तथा अन्य वैज्ञानिक साधनों द्वारा प्रेक्षणों के आधार पर यह बतलाया कि हमारा ब्रह्मांड लगातार फैलता जा रहा है।
बिग बैंग सिद्धान्त (Big Bang Theory)- इस सिद्धान्त को बेल्जियम के खगोलज्ञ एवं पादरी जार्ज लेमेतेर ने दिया ।
इस सिद्धान्त के अनुसार ” अरबों साल पहले यह ब्रह्मांड एक बिन्दु के रूप में था। इस बिन्दु को वैज्ञानिकों ने विलक्षणता का बिन्दु (Point of singularity) कहा है। इस बिन्दु में एक महाविस्फोट हुआ और इसका विस्तार होना शुरू हो गया। इस महाविस्फोट ने अति सघन पिंड को छिन्न-भिन्न कर दिया और इस पिंड के टूटे हुए अंश अर्थात फोटॉन तथा लेप्टोक्वार्क, ग्लुऑन अंतरिक्ष में दूर-दूर तक छिटक गए और उसी से आकाशगंगाएं बनीं जो अभी तक भाग रही हैं।

इस सिद्धान्त के अनुसार बिग बैंग के तत्काल बाद एक सेकेण्ड के कई गुना छोटे भाग के समयांतराल में ब्रह्मांड परमाण्विक आकार से बढ़कर कॉस्मिक आकार में बदल
गया। उसके बाद ब्रह्मांड के प्रसार की गति थोड़ी धीमी हुई पर इसका ताप काफी समय तक अत्यधिक रहा। एक खरब वर्षो के बाद तारों तथा गैलेक्सियों का पहली बार अवतरण हुआ। हमारा सौर मंडल भी 4.5 खरब वर्ष पूर्व बना है। पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत लगभग 0.37 खरब वर्ष पूर्व हुआ।

हर्मन बांडी, थॉमस गोल्ड और फ्रेड हॉयल नाम के ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने बिग बैंग सिद्धान्त को चुनौती दी। उन्होनें 1948 ई० में ब्रह्मांड की उत्पत्ति के एक नए सिद्धान्त को प्रस्तुत किया जिसे स्थायी अवस्था सिद्धान्त (Steady state theory) कहा जाता है।


स्थायी अवस्था सिद्धान्त – Steady state Theory)

इस सिद्धान्त के अनुसार ब्रह्मांड का न तो महाविस्फोट के साथ आरंभ हुआ था न ही कभी इसका अंत होगा
विशाल ब्रह्मांड का न आदि है और न अन्त । इस सिद्धान्त के अनुसार आकाशगंगाएं आपस में दूर तो होती जाती हैं परंतु उनका आकाशीय घनत्व अपरिवर्तित रहता है यानी दूर होती आकाश गंगाओं के बीच की खाली जगहों में नई आकाशगंगाएँ बनती रहती हैं। इसीलिए ब्रह्मांड का पदार्थ घनत्व एक-दम स्थिर बना रहता है। आज तक दिये गए सभी सिद्धान्तों में बिग बैंग सिद्धान्त को ही सबसे ज्यादा मान्यता प्राप्त हुई।

बिग बैंग सिद्धान्त का प्रतिपादन निम्नांकित तीन अन्वेषणों पर आधारित है:

(i) ब्रह्मांड का लगातार प्रसार (Continuous expansion of the universe)
(ii) ब्रह्मांड विधुत चुम्बकीय विकिरण से भरा (Universe is filled with
electromagnetic radiation)
(iii) ब्रह्मांड का अधिकाधिक द्रव्यमान रहस्यमय ढंग से हमारी दृष्टि से परे है। (Most of
the mass of Universe is my steriously hidden from our view)

अवरक्त विस्थापन क्या होता है ? -Red shift of galaxies

यदि हम प्रकाश-स्रोत की ओर चले तो प्रकाश तरंग
की आवृत्ति में आभासी वृद्धि होगी अर्थात यह दृश्य प्रकाश के स्पेक्ट्रम के नीले वर्ण की ओर विस्थापित होगी। इसके विपरीत यदि प्रकाश-स्रोत की दूरी हमसे बढ़ती जाए तो प्राप्त प्रकाश की आवृत्ति में आभासी कमी होगा और यह आवृत्ति दृश्य स्पेक्ट्रम के लाल रंग की ओर विस्थापित होगी। इस प्रकार के विस्थापन को अवरक्त विस्थापन (Red shift) कहते हैं।

अवरक्त विस्थापन के आधार पर ही 1929 ई० में कैलीफोर्निया स्थित माउंट विल्सन वेधशाला (Observatory ) में कार्य करते हुए एडबिन हब्बल ने ब्रह्मांड (universe meaning in hindi) में होनेवाले प्रसार की पुष्टि की, अपने प्रेक्षणों के दौरान हब्बल ने पाया कि कुछ निकटतम मंदाकिनियों के वर्णक्रमों की अवशोषण रेखाएँ वर्णक्रम के लाल छोर की ओर खिसक रही हैं।

अपने प्रेक्षणो के क्रम में वे निम्नांकित दो निष्कर्षों पर पहुँचे-Universe meaning in hindi

(i) सभी मंदाकिनी (Galaxy) हमसे दूर जा रहे हैं।
(ii) कोई मंदाकिनी हमसे जितनी दूरी पर है वह उतनी ही तेजी से हमसे दूर जा रहा है। इस प्रकार मंदाकिनी का वेग (v), दूरी (d) के समानुपाती होगा, v=Hd उपर्युक्त सूत्र को हब्बल का नियम कहते हैं। यहाँ H एक नियतांक है जिसे हब्बल नियतांक या हब्बल पैरामीटर (Hubble Parameter ) कहा जाता है।

हब्बल पैरामीटर का मात्रक समय का व्युत्क्रम (inverse of time ) होता है। अतः अवश्य ही समय का मात्रक होगा। इस प्रकार हम यदि समय को पीछे लेते जाएँ तो ब्रह्मांड की आयु का आकलन से 15×10^9 वर्ष आता है। प्राप्त प्रेक्षणों के आधार पर ब्रह्मांड की
आयु 10x 10^9 वर्ष से 19x 10^9 वर्ष के बीच होती है।

एक अन्य वैज्ञानिक आइजक ऐसीमोव का कहना है कि हब्बल के निरूपण के अनुसार यदि दूरी के साथ प्रतिसरण की गति बढ़ती जाए तो 125 करोड़ प्रकाश वर्ष की दूरी पर मंदाकिनियाँ इस तेजी से प्रतिसरण करेंगी कि उन्हें देख पाना हमारे लिए संभव नहीं होगा.

मंदाकिनी किसे कहते है ? – Galaxy meaning in hindi

मंदाकिनी अरबों तारों का एक विशाल निकाय है। तारे मंदाकिनियों के साथ बंधे रहते हैं इसके लिए चारों मौलिक बलों (गुरुत्वाकर्षण बल, विद्युत् चुम्बकीय बल (Electron magnetic Force) प्रबल या दृढ़ बल (स्ट्रांग Force) और कमजोर बल (Weak force)) में गुरुत्वाकर्षण बल जिम्मेदार होता है।

ब्रह्मांड में लगभग 100 अरब मंदाकिनियाँ (10^11मंदाकिनियाँ) हैं, और प्रत्येक मंदाकिनी में औसतन 100 अरब तारे ( 11^11तारे) होते हैं। यानी ब्रह्मांड में तारों की कुल संख्या लगभग 10^22है। प्रत्येक मंदाकिनी में तारों के अतिरिक्त गैसें तथा धूल होती हैं। मंदाकिनी का 98% भाग तारों से तथा शेष 2% गैसों या धूल से बना है।

मंदाकिनी का वर्गीकरण / गैलेक्सी कितने प्रकार की होती है? (Classification of Galaxy)-

मंदाकिनियों को प्रायः उनके आकृति के आधार पर तीन वर्गों में बाँटा गया है-
(i) सर्पिल (Spiral )
(ii) दीर्घवृत्तीय (Elliptical )
(iii) अनियमित (Irregular) ।

अब तक की ज्ञात मंदाकिनियों में 80% सर्पिल 17% दीर्घवृत्तीय तथा 3% अनियमित आकार वाली हैं। हमारी मंदाकिनी-दूग्धमेखला (Milkyway) या आकाशगंगा और इसकी सबसे नजदीकी मंदाकिनी देवयानी (Andromeda) सर्पिल आकार वाली मंदाकिनी है। सर्पिल मंदाकिनियाँ दूसरी मंदाकिनियाँ से प्रायः काफी बड़ी होती है।

दुग्धमेखला किसे कहते है -Our own galaxy The Milkyway

हमारा सौरमंडल दुग्धमेखला (Milkyway) या आकाशगंगा नामक मंदाकिनी का सदस्य है। इसकी व्यास लगभग 10 प्रकाश वर्ष और यह मंथर गति से चक्कर काट रही है। दुग्धमेखला मंदाकिनी, अपने केन्द्र के चारों ओर धीरे-धीरे घूमती है और तारे इसके केन्द्र के चारों ओर धीरे-धीरे घूमते हैं। सूर्य भी (सौरमंडल सहित) इसके केन्द्र के चारों ओर घूर्णन करता है। इसे एक परिक्रमा पूरी करने में लगभग 250 मिलियन (250 करोड़) वर्ष लगता है। पृथ्वी पर लोग, दुग्धमेखला मंदाकिनी का अभिमुख दृश्य (end-on view or side view) देख पाते हैं, क्योंकि
पृथ्वी स्वयं इस मंदाकिनी का हिस्सा है।

हमारी मंदाकिनी में तारे चपटी चक्रिकानुमा संरचना में अन्तर्विष्ट होते हैं जो अंतरिक्ष के अन्दर 10 प्रकाश वर्ष तक फैली होती है। तारों की चक्रिका केन्द्र पर काफी मोटी होती है जो मंदाकिनी के केन्द्र पर तारों के अपेक्षाकृत उच्च सांद्रण को दर्शाता है। हमारा सूर्य और उसके ग्रह,मंदाकिनी के केन्द्रीय भाग से लगभग 3×10^4 प्रकाश वर्ष की दूरी पर इस चक्रियनुमा संरचना के एक पार्श्व पर स्थित है। अतः सूर्य दुग्धमेखला मंदाकिनी के केन्द्र से काफी दूर है।

यदि आकाश स्वच्छ है, तो दुग्धमेखला मंदाकिनी अंधेरी रात में उत्तर से दक्षिण आकाश को हल्का सफेद तारों की चौड़ी पट्टी के रूप में प्रतीत होती है, जो करोड़ों टिमटिमाते तारों से मिलकर बनी है। अंधेरी रात में पृथ्वी से देखने पर यह प्रकाश की बहती हुई नदी की तरह प्रतीत होती है, यह आकाश गंगा कहलाती है।

तारामंडल क्या होता है ? -Constellation meaning in hindi

तारामंडल पृथ्वी से देखने पर तारों का कोई समूह किसी विशेष आकृति का आभास देता प्रतीत होता है। हमारे पूर्वजों ने ऐसे कई तारा समूहों में कुछ आकृतियों की कल्पना की और उनको विशिष्ट नाम दिए । तारों के किसी ऐसे समूह को तारामंडल कहते हैं। इन तारामडलों का नामाकरण उनकी आकृति के आधार पर की गई है। प्रमुख तारामंडल हैं – वृहत्सप्तऋषि मंडल (Ursa major), लधु सप्तऋषि (Ursa minor), मृग (Orion), सिग्नस
(Cygnus), हाइड्रा (Hydra) आदि ।

आकाश में कुल 89 तारामंडल हैं। इनमें से सबसे बड़ा तारामंडल सेन्टॉरस है जिसमें 94 तारे हैं। हाइड्रा में कम से कम 68 तारे हैं। वृहत् सप्तर्षि नामक तारामंडल में बहुत से तारे हैं जिसमें सात सर्वाधिक चमकदार तारें हैं जो आसानी से दिखाई देते हैं। इन तारों से बना तारामंडल सामान्यतया वृहत् सप्तर्षि या बिग डिपर कहलाता है।
लघु सप्तर्षि में भी अधिक चमक वाले सात प्रमुख तारे हैं.

मृग (Orion) तारामंडल को शीत ऋतु में देखा जा सकता है। मृग सर्वाधिक भव्य तारामंडलों में से एक है। इसमें सात चमकीले तारे हैं, जिनमे से चार किसी चतुर्भुज की आकृति
बनाते प्रतीत होते हैं ।इस चतुर्भुज के एक कोने पर सबसे विशाल तारों में एक बीटलगीज नाम का तारा स्थित है जबकि दूसरे विपरीत कोने पर रिगेल नामक अन्य चमकदार तारा स्थित है। Orian के अन्य तीन प्रमुख तारे तारामंडल के मध्य में एक सरल रेखा में अवस्थित है।

आसमान के तारे क्या है? -stars meaning in hindi

तारे ऐसे खगोलीय पिंड हैं, जो लगातार प्रकाश एवं ऊष्मा उत्सर्जित करते हैं। अतः सूर्य भी एक तारा है। भार के अनुपात में तारों में 70% हाइड्रोजन. 28% हीलियम, 1.5% कार्बन, नाइट्रोजन एवं निऑन तथा 0.5% में लौह एवं अन्य भारी तत्व होते हैं। तारों को, उनके भौतिक अभिलक्षणों जैसे आकार, रंग, चमक (दीप्ति) और ताप के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है।

तारे तीन रंग के होते हैं-(i) लाल (Red) (ii) सफेद (White) और (iii) नीला (Blue).

तारे का रंग पृष्ठ ताप द्वारा निर्धारित होता है। तारे, जिनका पृष्ठ ताप अपेक्षाकृत निम्न होता है, लाल रंग के होते हैं, उच्च पृष्ठ ताप वाले तारे सफेद होते हैं जबकि वे तारे, जिनका पृष्ठ ताप अत्यधिक उच्च होता है, रंग में नीले होते हैं।

प्रॉक्जिमा सैन्टॉरी क्या है ? – Proxima Centauri hindi

यह सूर्य के बाद पृथ्वी के सबसे निकट का तारा है। पृथ्वी से इसकी दूरी 4.22 प्रकाश वर्ष है। ऐल्फा सैन्टॉरी पृथ्वी से 4.3 प्रकाश वर्ष की दूरी पर है। सभी तारे (ध्रुवतारा को छोड़कर) रात्रि आकाश में पूर्व से पश्चिम की ओर चलते प्रतीत होते है, क्योंकि पृथ्वी स्वयं अपने धूरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूर्णन करती है, तारे विपरीत दिशा में पूर्व से पश्चिम की ओर चलते हुए प्रतीत होते हैं। अतः आकाश में तारों की आभासी गति पृथ्वी के अपनी धूरी पर घूर्णन के कारण होती है। ध्रुव तारा उत्तरी ठीक ऊपर स्थिर प्रतीत होता है और समय के साथ अपनी स्थिति नहीं बदलता है क्योंकि यह पृथ्वी के घूर्णन की धुरी (अक्ष) पर स्थित होता है। ध्रुव तारा अर्सा माइनर या लिटिल बियर तारा समूह का सदस्य है।

तारों का जन्म एवं विकास (Birth and Evolution of a star)

तारे के निर्माण का मुख्यतः हाइड्रोजन एवं हीलियम गैस से होता है। तारे का जीवन चक्र मंदाकिनियों में उपस्थित हाइड्रोजन और हीलियम गैसों के घने बादलों के रूप मे एकत्रित होने के साथ आरंभ होता है।

तारे का जीवनचक्र आकाशगंगा में हाइड्रोजन तथा हीलियम गैस के संघनन से प्रारंभ होता है जो अन्ततः घने बादलों का रूप धारण कर लेते हैं। इन बादलों को Oort clouds कहा जाता है। इन बादलों का ताप -173°C होता है। जैसे-जैसे इन बादलों का आकार बढ़ता जाता है, गैसों के अणुओं के बीच गुरुत्वाकर्षण बल बढ़ता जाता है। जब बादलों का आकार काफी बड़ा हो जाता है तब यह स्वयं के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण सिकुड़ता चला जाता है यह सिकुड़ता हुआ घना गैस पिंड आदि तारा (Protostar) कहलाता है। ऐसे तारे प्रकाश उत्सर्जित
नहीं करते है। इन्हे हम protostar कहते है

प्रोटोस्टार तारे से तारे का निर्माण (Formation of star from protostar)-

प्रोटोस्टार तारा, अत्यधिक संघन गैसीय द्रव्यमान है जो विशाल गुरुत्वाकर्षण बल के कारण आगे भी संकुचित होता रहता है। ज्योंही protostar आगे संकुचित होना आरंभ करता है, गैस के बादल में उपस्थित हाइड्रोजन परमाणु अधिक जल्दी-जल्दी परस्पर टकराते हैं। हाइड्रोजन परमाणु के ये टक्कर आदि तारे के ताप को अधिकाधिक बढ़ा देते हैं।

आदि तारे के संकुचन की प्रक्रिया लाखों वर्षों तक चलती रहती है जिसके दौरान आदि तारा में आन्तरिक ताप, आरंभ में मात्र -173°C से लगभग 10^7°C तक बढ़ता है। इस अत्यधिक उच्च ताप पर, हाइड्रोजन की नाभिकीय संलयन अभिक्रियाएँ होने लगती हैं। इस प्रक्रिया में चार छोटे हाइड्रोजन नाभिक संलयित होकर बड़े हीलियम नाभिक बनाते हैं और ऊष्मा तथा प्रकाश के रूप में ऊर्जा की विशाल मात्रा उत्पन्न होती है। हाइड्रोजन के संलयन से हीलियम बनने के दौरान उत्पन्न ऊर्जा आदि तारा को चमक प्रदान करता है और वह तारा बन जाता है।

तारे के जीवन का अंतिम चरण (Final Stages ofa Star’s life)-

अपने जीवन के अन्तिम चरण के पहले भाग में, तारा लाल (रक्त) दानव प्रावस्था (Red giant phase) में प्रवेश करता है, इसके बाद उसका भविष्य उसके प्रारंभिक द्रव्यमान पर निर्भर करता है। यहाँ दो स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं-

(a)यदि तारे का प्रारंभिक द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के तुल्य होता है, तो रक्त दानव तारा अपने प्रसारित बाह्य आवरण को खो देता है और उसका क्रोड सिकुड़ करके श्वेत वामन तारा (White dwarf star) बनाता है जो अंत मे अंतरिक्ष में पदार्थ के सघन पिंड के रूप में नष्ट हो जाता है।

(b)यदि तारे का प्रारंभिक द्रव्यमान, सूर्य के द्रव्यमान से काफी अधिक होता है, तो उससे बना रक्त दानव तारा, अधिनव तारे (Supernova star) के रूप में विस्फोट करता है, और इस विस्फोटित अधिनव तारे का क्रोड संकुचित होकर न्यूट्रॉन तारा (Neutron star)
अथवा कृष्ण छिद्र (Black hole) बन जाता है।

रक्त-दानव प्रावस्था (Red-Gaint phase)-

आरंभ में, तारों में मुख्यतः हाइड्रोजन होती है। समय बीतने के साथ, हाइड्रोजन केन्द्र से बाहर की ओर, हीलियम में परिवर्तित हो जाती है। अब, जब तारे के क्रोड में उपस्थित सम्पूर्ण हाइड्रोजन, हीलियम में परिवर्तित हो जायगी. तो core में संलयन अभिक्रिया बंद हो जायगी। संलयन अभिक्रियाओं के बंद हो जाने के कारण, तारे का core के भीतर दाब कम हो जाएगा, और core अपने निजी गुरुत्व के तहत संकुचित होने लगेगा। लेकिन तारे के बाहरी आवरण में कुछ हाइड्रोजन बची रहती है, जो संलयन अभिक्रिया कर ऊर्जा विमुक्त करती रहेगी (परन्तु तीव्रता बहुत ही कम होगी)। इन सभी परिवर्तनों के कारण, तारे में संतुलन गड़बड़ हो जाता है और उसे पुनः व्यवस्थित करने के उद्देश्य से, तारे को उसके बाहरी क्षेत्र में प्रसार करना
पड़ता है, जबकि गुरुत्वाकर्षण बलों के प्रभाव के कारण उसके क्रोड में संकुचन होता है.

अतः सामान्य तारे से रक्त दानव तारे में परिवर्तन में, तारे का क्रोड सिकुड़ता है जबकि बाहरी आवरण में अत्यधिक प्रसार होता है। यह रक्त दानव तारा कहलाता है क्योंकि यह रंग में लाल और आकार में दानवाकार होता है। हमारा अपना तारा सूर्य, अब से लगभग 5000 मिलियन वर्षों के बाद रक्त-दानव तारे में बदल जाएगा। सूर्य का प्रसारित बाहरी आवरण तब इतना बड़ा हो जाएगा कि यह अपने ग्रहों जैसे बुध, शुक्र एवं पृथ्वी को भी निगल जाएगा। तारा, रक्त-दानव प्रावस्था मे अपेक्षाकृत थोड़े समय ही रहता है क्योंकि इस अवस्था में यह अस्थायी रहता है।

श्वेत वामन तारे का निर्माण (Formation of white dwarf star)

जैसा कि ऊपर बताया गया है कि तारा जब रक्त-दानव प्रावस्था में पहुँचता है, तो उसका भविष्य उसके द्रव्यमान पर निर्भर करता है। जब रक्त-दानव तारा का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के तुल्य होता है तो वह अपना प्रसारित बाह्य आवरण खो देगा, केवल उसका क्रोड बचा रहेगा। यह हीलियम क्रोड गुरुत्वाकर्षण के कारण धीरे-धीरे द्रव्य के अत्यधिक संघन पिंड में संकुचित होगा। हीलियम क्रोड के इस अत्यधिक संकुचन के कारण क्रोड का ताप अत्यधिक बढ़ जाएगा और नाभिकीय संलयन अभिक्रियाओं का एक अन्य सेट प्रारंभ हो जाएगा. जिसमे हीलियम भारी तत्वों जैसे कार्बन में परिवर्तित होता है, और ऊर्जा की अत्यधिक विशाल मात्रा मुक्त होगी। इस प्रकार के क्रोड के सम्पूर्ण हीलियम थोड़े ही समय में कार्बन में परिवर्तित हो जाती है और तब पुनः संलयन अभिक्रियाएँ पूर्णतः रूक जाती हैं।

अब ज्योहि तारे भीतर उत्पन्न हो रही ऊर्जा बंद हो जाती है, तारे का क्रोड उसके अपने भार के कारण सिकुड़ने लगता है और यह श्वेत-वामन तारा (White dwarf star) बन जाता है। श्वेत-वामन एक मृत तारा है क्योंकि यह संलयन प्रक्रिया द्वारा कोई नवीन ऊर्जा नहीं उत्पन्न करता है। श्वेत-वामन तारा, जब अपनी संचित सम्पूर्ण ऊर्जा खो देता
है, तो वह चमकना बंद कर देगा।

इसके बाद श्वेत-वामन तारा कृष्ण वामन (Black
dwarf
) हो जाएगा और अंतरिक्ष में पदार्थ के सघन पिंड के रूप में विलीन हो जाएगा। श्वेत-वामन तारे का घनत्व लगभग 10,000 kg/m3 होता है। एक धुंधले श्वेत वामन तारे सीरियस (Serius) नामक चमकीले तारे के
निकट देखा गया है।

अधीनव तारे तथा न्यूट्रॉन तारे का निर्माण (Formation of Supernova star and Neutron star)

यदि किसी तारे का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से बहुत अधिक हो तो रक्त दानव प्रावस्था के क्रम में इसके हीलियम क्रोड के संकुचन से विमुक्त नाभिकीय ऊर्जा
बाहरी आवरण में तेज दमक के साथ विस्फोट उत्पन्न कर देती है। यह विस्फोट आकाश को कई दिनों तक प्रकाशित करता है। ऐसा विस्फोटक तारा अधिनव (Supernova) तारा कहलाता है। सुपरनोवा विस्फोट के बाद भी इसके क्रोड का संकुचन होते रहता है और वह न्यूटॉन तारा बन जाता है। हमारी मंदाकिनी दुग्धमेखला में न्यूट्रॉन तारों की संख्या का अनुमान लगभग 10^8 लगाया गया है, जिनमें से लगभग एक हजार ऐसे तारों को देखा गया है। न्यूट्रॉन तारे का घनत्व नाभिकीय घनत्व की कोटि का (1017kg/m3 ) होता है। न्यूट्रॉन तारों का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का लगभग दो गुना तथा त्रिज्या लगभग 10 किमी०
होती है। यह अदीप्त होता है तथा सीधे तौर पर नहीं देखा जा सकता है।

कृष्ण छिद्र क्या होते है ? -Black Hole in hindi

न्यूट्रॉन तारे का भविष्य भी उसके द्रव्यमान पर निर्भर करता है। अनुमान के अनुसार भारी न्यूट्रॉन तारों का संकचुन अनिश्चित काल तक हो सकता है। इसी क्रम में जब m द्रव्यमान का एक न्यूट्रॉन तारा संकुचित होकर त्रिज्या r =2Gm/c2 (जहाँ C, प्रकाश की चाल, तथा G, गुरुत्वाकर्षण नियतांक है) प्राप्त कर ले तब वह कृष्ण छिद्र
(Black Hole) बन जाता है।

सर्वप्रथम मिचेल (Mitchell) ने कृष्ण छिद्र के अस्तित्व की कल्पना की थी। black hole अपने पृष्ठ से किसी चीज का, यहाँ तक कि प्रकाश का भी पलायन नहीं होने देते हैं। कारण यह है कि black hole में अत्यधिक आकर्षण बल होता है। black hole से प्रकाश भी पलायन नहीं कर सकता है इसीलिए black hole अदृश्य होते हैं, वे देखे नहीं जा सकते हैं। इसकी उपस्थिति को, आकाश में उसके पड़ोसी पिंडों पर उसके गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र के प्रभाव द्वारा केवल महसूस किया जा सकता है ।

Hello दोस्तों अब हमारे ब्रह्माण्ड का यह सफऱ ब्लैक हॉल पर आकर खत्म हो जाता है. क्युकी हम यह नहीं जानते है. ब्लैक हॉल के अंदर exactly क्या होता है.

मै आशा करता हूँ आपको universe के बारे मे काफी कुछ समझ मे आ गया होगा. ये article” ब्रह्माण्ड के बनने से लेकर अब तक का सफर -universe meaning in hindi ” पढ़ने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया. उम्मीद करता हुँ. कि इस article से आपको बहुत कुछ नया जानने को मिला होगा