जैव-विविधता से जुड़े रोचक तथ्य- fact about Biodiversity in Hindi

जैव-विविधता से जुड़े रोचक तथ्य- fact about Biodiversity in Hindi

Biodiversity in Hindi-हेलो दोस्तों आज के इस आर्टिकल में हम पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जीवो में जो विभिन्न ता पाई जाती है। उनसे जुड़े कुछ रोचक तथ्य और scientific terms को जानेगे। अगर आप का background जीव विज्ञान से नहीं है। तब इन तथ्यों को समझने में आपको थोड़ी problems हो सकती है।

1)जीव जगत की विविधता को ध्यान में रखते हुए और उनके अध्ययन को सरल बनाने हेतु जीवों को आपसी समानताओं एवं विषमताओं के आधार पर विभिन्न समूहों में बाँटा गया है।

2)टैक्सोनोमी जीव विज्ञान की वह शाखा है जिसके अंतर्गत जीवों का वर्गीकरण एवं नामकरण किया गया है।

3)क्रमिकी (Systematics) विज्ञान की वह शाखा है जिसमें जीवों के वर्गीकरण, नामकरण तथा पहचान के साथ-साथ उनके विकासीय संबंधों का भी अध्ययन किया जाता है।

4)कैरोलस लीनियस ने 1758 ई. में आधुनिक वर्गीकरण की नींव डाली। इन्हें आधुनिक वर्गीकरण का पिता कहा जाता है।

5)जॉन रे ने सर्वप्रथम जाति (species) की धारणा दी।

6)जीवों का वर्गीकरण करते समय जैव विकास ध्यान में रखना इसलिए आवश्यक है क्योंकि विकास के क्रम के अनुसार ही उन्हें समूहों में बाँटा जाता है।

7)कैरोलस लीनियस ने समस्त जीवों को पादप जगत एवं जंतु जगत में बाँटा। इसके पश्चात प्रत्येक जगत को क्रमशः संघ/खंड, वर्ग, गण, कुल, वंश एवं जाति में बाँटा गया।

8)जीवों के नामकरण की द्विनाम पद्धति की धारणा भी सर्वप्रथम कैरोलस लीनियस ने दी।इस पद्धति के अनुसार प्रत्येक जीव के नाम के दो स्वरूप होते हैं। पहला नाम वंशनाम होता है, जबकि दूसरा शब्द जाति संकेत पद होता है।

9)रॉर्बट व्हिटेकर (1959) ने वर्गीकरण की पंच-जगत पद्धति का प्रस्ताव दिया। इन्होंने जीवों को पाँच जगत-मोनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई, प्लांटी एवं एनिमेलिया में बाँटा।

10)जगत-मोनेरा के अंतर्गत सरल, सूक्ष्मदर्शी, एककोशिक जीव आते हैं जिनमें केंद्रक नहीं पाए जाते हैं उदाहरण-जीवाणु, नील-हरित शैवाल।

11)जगत-प्रोटिस्टा के अंतर्गत सरल, एककोशिक जीव आते हैं, किंतु इनकी कोशिका में निश्चित केंद्रक पाए जाते हैं। उदाहरण-अमीबा, शैवाल।

12)जगत-फंजाई के अंतर्गत सरल, अवहरित, क्लोरोफिल रहित यूकैरियोटिक आते हैं जिनके शरीर में कवक जाल तथा हाइफा पाए जाते हैं। इस समूह के अधिकतर जीव परजीवी अथवा मृतजीवी होते हैं। उदाहरण-पेनिसिलियम, यीस्ट।

13)जगत-प्लांटी के अंतर्गत बहुकोशिक, यूकैरियोटिक जीव आते हैं, जिनमें कोशिका भित्ति तथा क्लोरोफिल पाए जाते हैं। ये अपना भोजन प्रकाश संश्लेषण द्वारा प्राप्त करते हैं।

14)जगत-ऐनिमेलिया के अंतर्गत बहुकोशिक, कोशिकाभित्ति रहित, यूकैरियोटिक आते है, जिनमें
क्लोरोफिल नहीं पाए जाते हैं। ये जंतु परपोषी या विषमपोषी होते हैं।

15)पादप जगत का वर्गीकरण शरीर की रचना, विशिष्ट ऊतकों की मौजूदगी तथा बीज एवं फल के निर्माण पर आधारित है।

16)पादप जगत को दो उप जगत-क्रिप्टोगैम्स एवं फैनरोगैम्स में बाँटा गया।

17)बीज रहित एवं पुष्प रहित क्रिप्टोगैम्स को पुनः तीन खंड अर्थात् थैलोफाइटा, ब्रायोफाइटा तथा टेरिडोफाइटा में विभाजित किया गया है।

18)थैलोफाइटा के अंतर्गत पुरातन, सरल पौधे आते हैं, जिनका शरीर थैलस समान होता है। शरीर(Biodiversity in Hindi) में अलग जड़, तना तथा पत्तियाँ नहीं होते हैं। संवहनीय तंत्र अविकसित होते हैं तथा पोषण प्रायः प्रकाश संश्लेषण द्वारा होता है। उदाहरण-शैवाल, लाइकेन्स।

19)ब्रायोफाइटा के अंतर्गत छोटे, सरल, हरे रंग के पौधे आते हैं, जिनका शरीर तना, पत्तियों एवं राइजॉयड में विभेदित रहता है। इन्हें पादप जगत का उभयचर माना जाता है।

20)टेरिडोफाइटा के अंतर्गत संवहन ऊतक रखने वाले तथा जड़, तना एवं पत्तियों में विभेदित शरीर रखने वाले पौधे आते हैं। उदाहरण-फर्न, क्लब मॉस,अश्वपुच्छ आदि।

21)उप-जगत फैलरोगैम्स के अंतर्गत उच्च कोटि के पुष्प एवं बीज रखने वाले पौधे आते हैं,जिनमें संवहन तंत्र पूर्ण विकसित होते हैं। फूलों की उपस्थिति और अनुपस्थिति के आधार पर इन्हें दो समूहों-जिम्नोस्पर्मस एवं एंजियोस्पर्मस में बाँटा गया।

22)जिम्नोस्पर्मस के अंतर्गत ऐसे पौधों को रखा गया जिनके बीज नग्न होते हैं और इनमें फूल एवं फलों का अभाव रहता है। उदाहरण-साइकस, पाइनस आदि।

23)एंजियोस्पर्मस के अंतर्गत आने वाले पौधों में फल, फूल और बीज होते हैं। इनके बीज फल के भीतर बंद रहते हैं। इन्हें पुष्पीपादप भी कहा जाता है। कॉटिलीडन की संख्या के आधार पर इन्हें पुन: एकबीजपत्री और द्विबीजपत्री समूहों में विभाजित किया गया है। उदाहरण-गेहूँ,मक्का, मटर, आलू आदि।

24)जगत-ऐनिमेलिया के जंतुओं को कई मुख्य संघों में बाँटा गया है-पॉरिफेरा, सीलेंटरेटा,प्लैटिहिल्मिथीज, एस्केल्मिथीज, ऐनेलिडा, आथ्रोपोडा, मोलस्का, एकाइनोडर्मेटा, हेमीकॉर्डेटा तथा कॉर्डेटा।

25)संघ-पॉरिफेरा के अंतर्गत छिद्रयुक्त, द्विस्तरीय, असममित या अरीय सममित, अगुहीत जलीय प्रणाली आते हैं, जिनमें कंटिकाएँ पाई जाती हैं और इनमें नाल तंत्र विकसित होता है। उदाहरण-साइकॉन, यूस्पंजिया।

26)संघ-सीलेंटरेटा के अंतर्गत द्विस्तरीय, अरीय सममित, जठर वाहिनी गुहा रखने वाले अगुहीत जलीय प्राणी आते हैं। शरीर में दंश कोशिकाएँ होती हैं तथा जीवन चक्र के दौरान पीढ़ी एकांतरण (Biodiversity in Hindi)भी होता है। उदाहरण-हाइड्रा, जेलीफिश।

27)संघ-प्लेटिहेल्मिथीज के अंर्तगत द्विपार्वीय सममित, त्रिस्तरीय, अगुहीत चपटे कृमि आते हैं। उत्सर्जन के लिए ज्वाला कोशिकाएँ होती हैं। इस संघ के जंतु स्वतंत्रजीवी अथवा परजीवी होते हैं। उदाहरण-प्लेनेरिया, फीता कृमि।

28)संघ-एस्केल्मिथीज के अंतर्गत द्विपार्वीय सममित, त्रिस्तरीय तथा कूटप्रगुही गोल कृमि आते हैं। ये अधिकतर परजीवी होते हैं। उदाहरण-ऐस्केरिस, वूचेरेरिया।

29)संघ-ऐनेलिडा के अंर्तगत द्विपार्श्व सममित, त्रिस्तरीय, खंडित एवं वास्तविक देहगुहा रखने वाले जंतु आते हैं। प्रचलन अंग सीटी, चूषक या पैरापोडिया होता है और उत्सर्जन के लिए वृक्क होते हैं। उदाहरण-केंचुआ, नेरीज।

39)संघ-ऑर्थोपोडा के अंतर्गत द्विपार्वीय सममित, त्रिस्तरीय विखंडित रुधिर गुहा रखने वाले जंतु आते हैं जिनमें संधियुक्त उपांग होते हैं। उत्सर्जन के लिए मैलपीगी नलिकाएँ या हरित ग्रंथियाँ होती हैं। रुधिर तंत्र खुले प्रकार का होता है। उदाहरण-तेलचट्टा, केंकड़ा।

40)संघ इकाइनोडर्मेटा के अंतर्गत त्रिस्तरीय, अखंडित, अरीय सममित, पंचतयी, प्रगुही समुद्री जंतु (Biodiversity in Hindi)आते हैं। इनके शरीर की त्वचा पर कांटे होते हैं तथा जल संवहन तंत्र विकसित होता है। उदाहरण-तारा मछली, समुद्री खीरा।

41)संघ-हेमीकॉर्डेटा के अंतर्गत त्रिस्तरीय, प्रगुही, द्विपार्वीय सममित समुद्रीय जंतु आते हैं,जिनके शरीर के अग्र भाग में पृष्ठ रज्जु पाया जाता है तथा तंत्रिका रज्जु पृष्ठ एवं अघर, दोनों सतहों पर होते हैं। उदाहरण- -बैलेनोग्लोसस, सिफैलोडिस्कस।

42)संघ-कॉर्डेटा के जंतु द्विपार्वीय सममित, प्रगुही, त्रिस्तरीय होते हैं, जिनमें पृष्ठ ज्नु, तंत्रिका एवं क्लोम दरारें पाई जाती हैं। संघ-कॉडेंटा को दो समूहों में बाँटा गया-प्रोटोकॉडेटा (एक्रेनिया) और वर्टीब्रेटा (क्रेनिएटा)।

43)प्रोटोकॉडेटा के अंतर्गत समुद्री जंतु आते हैं, जिनमें कपाल, जबड़े, कशेरूकदंड तथा जोड़े उपांगों का अभाव होता है। उदाहरण-सलपा, एम्फीओक्सस)

44)वर्टीब्रेटा के अंतर्गत आने वाले जंतुओं में कपाल, जबड़े, कशेरूकदंड तथा जोड़े उपांग पाए जाते हैं। वर्टीब्रेटा को कई वर्गों में बाँटा गया-पिशीज, एम्फिबिया, रेप्टीलिया, एवीज और मैमेलिया।

45)वर्ग 1-पिशीज के अंतर्गत सभी मछलियाँ आती हैं। ये अनियततापी जलीय जंतु हैं जिनके शरीर पर शल्क, पंख होते हैं तथा श्वसन के लिए जलक्लोम पाए जाते हैं। हृदय दो कक्षों का बना होता है और ये जल में अंडे देते हैं। उदाहरण-स्कोलिओडन, रोहू।

46)वर्ग 2-एम्फिबिया के अंतर्गत उभयचर, अनियततापी जंतु आते हैं, जिनमें शल्क एवं पंख का अभाव होता है। इनके हृदय में तीन कोष्ठ होते हैं। ये अंडे देने वाले जंतु हैं।
उदाहरण-मेंढक, हाईला।

47)वर्ग 3-रेप्टीलिया के अंतर्गत स्थली, अनियततापी तथा रेंगकर चलने वाले जंतु आते हैं।
इनके हृदय में अपूर्ण विभाजित चार कोष्ठ होते हैं। यह स्थल पर अंडे देते हैं। उदाहरण-छिपकिली, (Biodiversity in Hindi)साँप।

47)वर्ग 4-एवीज के अंतर्गत नियततापी, पेड़ पर रहने वाले तथा हवा में उड़ने वाले जंतु आते है। इनमें पर पंख, पर एवं चोंच होती है। हृदय पूर्ण रूप से विभाजित चार कोष्ठों का बना होता है। ये अंडप्रजक होते हैं। उदाहरण-कबूतर, तोता।

48)वर्ग 5-मैमेलिया के अंतर्गत स्तनधारी नियततापी जंतु आते हैं, जिनके शरीर पर बाल होता है और बाह्य कर्ण मौजूद होता है। हृदय पूर्ण रूप से चार कोष्ठ में विभाजित रहता है। ये प्राय: सजीव प्रजक होते हैं। उदाहरण-कंगारू, चूहा, मनुष्य।

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