भू-चुम्बकत्व क्या है,भू-चुम्बकत्व की परिभाषा(Earth magnetism in hindi)

भू-चुम्बकत्व क्या है,भू-चुम्बकत्व की परिभाषा(Earth magnetism in hindi)

भू-चुम्बकत्व क्या है (Earth magnetism in hindi)-

किसी चुम्बक को उसके गुरुत्व केन्द्र से बाँधकर लटका दिया जाय तो वह सदैव उत्तर-दक्षिण दिशा में ठहरता है। इसी प्रकार यदि किसी लोहे की छड़ को पृथ्वी के अन्दर गाड़ दिया जाय तो वह चुम्बक(Earth magnetism in hindi) बन जाती है।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि पृथ्वी भी एक चुम्बक की भाँति इस प्रकार व्यवहार करती है जैसे इसके अन्दर एक बहुत शक्तिशाली चुम्बक स्थित हो, जिसका दक्षिणी ध्रुव पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव की ओर एवं उत्तरी ध्रुव पृथ्वी के दक्षिणी ध्रुव की ओर स्थित हो।

पृथ्वी के इस चुम्बकीय गुण का कारण अभी तक ज्ञात नहीं है तथा इस सन्दर्भ में बहुत सारे मत व्यक्त किये जाते हैं। पृथ्वी के चुम्बकीय गुण के बारे में 1600 में भू-विज्ञानी विलियम गिलबर्ट का मत था कि पृथ्वी का चुम्बकीय गुण उसके अन्दर स्थित एक बहुत बड़े चुम्बक के कारण होता है। परन्तु यह अवधारणा मान्य नहीं हुई क्योंकि पृथ्वी के अन्दर इतना अधिक ताप है कि वहाँ किसी चुम्बक में चुम्बकीय गुण रह ही नहीं सकता।

ग्रोवर के अनुसार, पृथ्वी का चुम्बकत्व इसके चारों ओर बहने वाली विद्युत धाराओं के कारण होता है। एक अन्य मत के अनुसार, पृथ्वी के अन्दर अत्यधिक ताप होने के कारण वहाँ लोहा आदि धातुयें पिघली हुई अवस्था में रहती है तथा पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूमने के कारण इन पिघली हुई धातुओं में संवहन धारायें उत्पन्न होती है, जिसके कारण चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है।

यह माना जाता है कि पृथ्वी के चुम्बक की अक्ष उसके घूमने की अक्ष से 11.5° का कोण बनाती है ।

पृथ्वी के चुम्बकत्व के तीन अवयव होते हैं-

(1) दिक्पात का कोण (angle of declination),
(2) नति कोण (angle of dip)
(3) चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक(horizontal component of magnetic field) ।

(1) दिक्पात का कोण (angle of declination)

पृथ्वी के किसी स्थान पर गुरूत्व केन्द्र से टकी हुई चुम्बकीय सुई(Earth magnetism in hindi) के अक्ष से गुजरने वाले उर्ध्वाधर तल को चुम्बकीय याम्योत्तर कहते हैं। जबकि किसी स्थान पर पृथ्वी के भौगोलिक उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुवों को मिलाने वाली रेखा में से गुजरने वाले उर्ध्वाधर तल को भौगोलिक याम्योत्तर कहते हैं।

किसी भी स्थान पर चुम्बकीय याम्योत्तर तथा भौगोलिक, याम्योत्तर के बीच के न्यूनकोण को दिकपात कोण कहते हैं। इसे α से प्रदर्शित करते हैं।

नति कोण-(Angle of dip)

यदि चुम्बकीय सुई को गुरूत्व केन्द्र से इस प्रकार लटका दिया जाए कि वह उर्ध्वाधर तल में घूम सके तो चुम्बकीय याम्योत्तर में स्थिर होने पर सुई क्षैतिज दिशा में कुछ झुक जायेगी। इस प्रकार की सुई नति सुई (Dip Needle) कहलाती है। पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध में सुई का उत्तरी सिरा तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में सुई का दक्षिणी सिरा नीचे की ओर झुकता है।

इस अवस्था में सुई की चुम्बकीय अक्ष चुम्बकीय याम्योत्तर में क्षैतिज दिशा के साथ जो कोण बनाती है उसे नति कोण कहते हैं।

इस प्रकार नति कोण वह कोण है जो चुम्बकीय क्षेत्र (Earth magnetism in hindi)की दिशा तथा क्षैतिज दिशा के बीच बनता है । इसे θ से प्रदर्शित किया जाता है।

चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक(horizontal component of magnetic field)

किसी स्थान पर चुम्बकीय याम्योत्तर में कार्य करने वाले पृथ्वी के चुम्ब्कीय क्षेत्र को क्षैतिज व उर्ध्वाधर घटकों में विनियोजित किया जा सकता है।

यहाँ क्षैतिज घटक H चुम्बकीय प्रयोगों की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है | α, θ एवं H इन तीन अवयवों से किसी स्थान पर पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का पूर्ण ज्ञान हो जाता है।

उदासीन बिन्दु (Neutral Points)-

किसी चुम्बक की बल रेखायें खींचते समय प्राप्त वक्र चुम्बक का क्षेत्र एवं पृथ्वी के क्षैतिज चुम्बकीय क्षेत्र के परिणामी क्षेत्र के कारण होते हैं ।

चुम्बक के समीप चुम्बक का चुम्बकीय क्षेत्र प्रबल रहता है जबकि पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का प्रभाव नगण्य रहता है । जैसे-जैसे हम चुम्बक से दूर होते जाते हैं चुम्कब का क्षेत्र घटता जाता है और पृथ्वी का तुलनात्मक प्रभाव बढ़ता जाता है।

इस प्रकार चुम्बक से दूर कुछ बिन्दु ऐसे होते हैं जहाँ पृथ्वी के क्षेत्र का क्षैतिज घटक चुम्बक(Earth magnetism in hindi) के क्षेत्र के ठीक बराबर तथा विपरीत दिशा में होता है । इन बिन्दुओं को उदासीन बिन्दु कहते हैं।

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