जार्ज साइमन ओम जीवनी हिंदी -Biography of Georg Simon Ohm in hindi

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  • जन्म-16 मार्च, 1787
  • जन्म स्थान-जर्मनी
  • निधन-1854 ई.
  • निधन स्थान-म्यूनिख

जार्ज साइमन ओम(Georg Simon Ohm)ने विद्युत सर्किट की गणनाओं को नया मोड़ दिया। ओज का सिद्धांत (ohm law )इतना सरल प्रतीत होता है की उसे मूल सिद्धांत मानना मुश्किल हो जाता है किंतु आज भौतिकी का हर विद्यार्थी उसे ‘ओम का सूत्र’ ohm’s law के नाम से ही जानता है। विद्युत अवरोध की गणना के लिए प्रयुक्त उपकरण का नाम भी ओम की स्मृति में रखा गया है

जार्ज साइमन ओम का जन्म -Georg Simon Ohm biography in hindi

जार्ज साइमन ओम का जन्म दक्षिण-पूर्वी जर्मनी की बावेरिया रियासत में 16 मार्च, 1787 को हुआ था। उनके पिता योहान ओम एक शिल्पी थे। जार्ज और मार्टिन के जन्म के बाद योहान का रुख विज्ञान और गणित के अध्ययन की ओर हुआ।

उसकी यही रुचि उसके दोनों पुत्रों को विरासत में मिली। स्थानीय विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त करके दोनों गणित के अध्यापक बन गए। जार्ज 18 साल की ही उम्र में बर्न के स्विस केण्टन में गाटस्टाइट शहर में अध्यापक हो गए। जिस सुपरवाइजर ने उन्हें प्रार्थनापत्र के आधार पर ही नियुक्ति दे दी थी

वह इस नाटे कद के, दुबले-पतले व्यक्ति को अपने स्कूल के गणित के अध्यापक के रूप में देखकर बड़ा ही निराश हुआ। किंतु कुछ ही दिनों बाद इस नौजवान युवक की योग्यता प्रकट हो आई। ओम(Georg Ohm biography) का स्वाध्ययन यूं ही चलता रहा, और 1811 में उन्हें गणित में डॉक्टरेट मिल गई।

अब उन्हें शौक उठा कि नैपोलियन के विरुद्ध सेना में भर्ती हो जाएं। किंतु पिता ने समझाया और वे अध्यापक के पद पर ही यथापूर्व बना रहे। 30 वर्ष की आयु में कोलोन के जेसुइट कालिज की फैकल्टी में वे गणित विभाग के अध्यक्ष हो गए।

विद्युत-विज्ञान मे ओम के नियम की स्थापना Discovery of Ohm’s Law in hindi

ओम की विद्युत-विज्ञान को सबसे बड़ी देन 1827 में दुनिया के सामने आई। यह उनका एक ग्रंथ था ‘विद्युत धाराओं की गणितीय माप-तोल’। यही वह निबंध था, जिसकी समकालीन विद्वतसमाज ने तो उपेक्षा की किंतु जिसे विद्युत सर्किट की गणनाओं के इतिहास में एक नया मोड़ समझा जा सकता है ओम की स्थापना (georg simon ohm inventions)इतनी सरल प्रतीत होती है कि उसे एक मूल सिद्धांत समझना मुश्किल लगता है,

इतनी सर्वसाधारण और प्रत्यक्ष वस्तु-सी लगती है वह। किंतु आज हाई स्कूलों में भौतिकी का हर विद्यार्थी उसे ‘ओम का सूत्र’ कहकर जानता है।

यह 1827 की बात है, जब प्रोफेसर ओम की आयु 40 वर्ष थी। ओम को आशा थी उनके अनुसंधान की विद्वज्जगत में सराहना होगी, किंतु उस पर शायद किसी की निगाह भी नहीं पड़ी। कुछ ने उसे पढ़ा भी परंतु उनकी दृष्टि में उसमें विज्ञान-विषयक कुछ भी नई चीज नहीं थी ओम गणित के प्राध्यापक थे, और प्रकृति से भावुक थे।

उन्हें उम्मीद थी कि प्रस्तुत पुस्तक के प्रकाशन की बदौलत उन्हें कुछ तरक्की मिलेगी, किंतु संस्कृति मंत्रालय के साथ उलटे उनकी कुछ झड़प हो गई और जार्ज साइमन ओम (georg simon ohm)ने कोलोन के जेसुइट कॉलेज में गणित की प्रोफेसरी से त्यागपत्र दे दिया।

इसका नतीजा यह हुआ कि उनके पास अब कोई नौकरी नहीं थी। अध्यापक-पद से त्यागपत्र देकर ओम के लिए अब ट्यूटरी वगैरह करके रोटी जुटाना भी बड़ा मुश्किल हो गया।

परंतु संघर्षों के इस मुश्किल दौर में भी उन्होंने हार
नहीं मानी उनका स्वाध्याय एवं परीक्षण यूं ही चलता रहा। वे चाहते थे कि कहीं पूर्ण स्थायित्व उन्हें प्राप्त हो जाए, तो वे अपने परीक्षण कार्यक्रम को वृहद ढंग से आगे बढ़ाएं लेकिन अध्यापन-कार्य में फिर से आने में उन्हें छः साल लग गए।

जर्मनी में तो उनके वैज्ञानिक कार्य की सराहना नहीं हुई किंतु ग्रेट ब्रिटेन में उनके पारखी थे। 1841 में लंदन की रायल सोसायटी ने उन्हें काप्ले पारितोषिक देकर सम्मानित किया।

जार्ज साइमन ओम की मृत्यु -Georg Simon Ohm death

जार्ज ओम की मृत्यु 1854 में म्यूनिख में हुई। तब उनकी आयु 67 थी। 1881 में पेरिस इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स की अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस में विद्युत-अवरोध की इकाई का नाम ‘ओम’ रखा गया।

अद्भुत संयोग है कि विद्युत की तीनों बड़ी इकाइयों का नामकरण—एम्पियर, वोल्ट, ओम—एक ऐतिहासिक अंतर्राष्ट्रीय त्रिमूर्ति की प्रतिष्ठा में ही रखा गया। इनमें एक फ्रेंच था, दूसरा इटेलियन, और तीसरा जर्मन । जर्मनी के ओम ने ही इन तीनों में वह परस्पर सूत्र-सम्बंध स्थापित किया था।

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