ठोस किसे कहते है,ठोस की परिभाषा, ठोस के बारे मे सम्पूर्ण जानकारी(Solid state in hindi)

ठोस किसे कहते है,ठोस की परिभाषा, ठोस के बारे मे सम्पूर्ण जानकारी(Solid state in hindi)

Solid state in hindi-ठोस वे पदार्थ होते हैं, जिनमें असम्पीड्यता (incompressibility),दृढ़ता (rigidity) तथा यांन्त्रिक सामर्थ्य (mechanical strength) होती है।ठोस में अणु, परमाणु या आयन अत्यधिक पास-पास होते हैं और परस्पर संसजक बल (cohesive force) द्वारा आपस में जुड़े रहते हैं अर्थात् ठोस में एक सुव्यवस्थित क्रमिक विन्यास होता है।

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अक्रिस्टलीय ठोस (Amorphous Solid state in hindi)

इन ठोसों में कण (अणु, परमाणु या आयन) किसी निश्चित क्रम में व्यवस्थित नहीं होते हैं, बल्कि अव्यवस्थित होते हैं। परन्तु इनमें निश्चित आकार, दृढ़ता और कठोरता हो सकती है। इन्हें वास्तव में अति प्रशीतित द्रव (supercooled liquids) कहा जाता है।

उदाहरण काँच, रबर, गलित सिलिका आदि। अक्रिस्टलीय ठोस, समदैशिक (isotropic) होते हैं, अर्थात् इनके भौतिक गुण सभी दिशाओं में समान होते हैं। अक्रिस्टलीय ठोसों(Solid state in hindi)के गलनांक (mp) तीव्र (sharp) नहीं होते हैं तथा इनमें कुछ सीमा तक सम्पीड्यता (compressibility) तथा दृढ़ता (rigidity) पायी जाती है।

क्रिस्टलीय ठोस (Crystalline Solid state in hindi)

क्रिस्टलीय ठोसों(solid meaning in hindi)में संघटन कण (अणु, परमाणु अथवा आयन) एक निश्चित क्रम में व्यवस्थित होते हैं, जिससे इनकी एक नियमित ज्यामितीय आकृति होती है।

क्रिस्टलीय ठोस विषमदैशिक (anisotropic) होते हैं, अर्थात् इनके भौतिक गुण जैसे—विद्युत चालकता, अपवर्तनांक, श्यानता आदि विभिन्न दिशाओं में भिन्न-भिन्न होते हैं। क्रिस्टलीय ठोसों के गलनांक तीव्र अथवा निश्चित होते हैं।

बन्धकता (bonding) के आधार पर क्रिस्टलीय ठोसों को निम्न चार वर्गों में विभाजित किया जाता है।

(i) आयनिक क्रिस्टल (lonic Crystals)

ये धनायनों व ऋणायनों से मिलकर बने होते हैं, जो प्रबल वैद्युत्-आकर्षण बलों से बन्धे होते हैं। उदाहरण NaCl, KNO, आदि।

(ii) अणुक क्रिस्टल (Molecular Crystals)

ये क्रिस्टल अणुओं से मिलकर बने होते हैं, जो वाण्डरवाल्स बलों से बंधे होते हैं। उदाहरणI,, शुष्क बर्फ (ठोस CO.,), ठोस CH , बर्फ आदि।

(iii) सहसंयोजक क्रिस्टल (Covalent Crystals)

ये क्रिस्टल परमाणुओं से मिलकर बने होते हैं। जो सहसंयोजक बन्ध के द्वारा बंधे रहते हैं। उदाहरण डायमण्ड, ग्रेफाइट, सिलिकॉन आदि।

(iv) धात्विक क्रिस्टल (Metallic Crystals)

इन क्रिस्टलों में धनावेशित धातु आयन करनेल, (Kernels) तथा मुक्त इलेक्ट्रॉन आपस में धात्विक बन्धों (metallic bonds) द्वारा बन्धे रहते

ब्रेग का नियम (Bragg’s Law)

ब्रेग ने ठोसों(Solid state in hindi) की किन्ही दो पर्तों के मध्य की दूरी तथा X-किरणों की तरंगदैर्घ्य में सम्बन्ध दर्शाने के लिए निम्न समीकरण दी

nλ = 2 d sin θ

n=परावर्तन की कोटि (order of reflection)
λ = x-किरणों की तरंगदैर्ध्य (wavelength of X-rays)
d = ठोस में दो पर्तों के बीच की दूर(distance between two planes)
θ = परावर्तन का कोण (angle of reflection)

इकाई सेल (Unit Cell solid meaning in hindi)

किसी क्रिस्टल की वह सबसे छोटी इकाई (unit), जिसको निरन्तर दोहराने (repeatation) पर क्रिस्टल जालक प्राप्त होता है, इकाई सेल कहते हैं। इकाई सेल की आकृति निम्न प्रकार की हो सकती है

(i) साधारण अथवा प्रिमिटिव इकाई सेल(Simple or Primitive Unit Cell)

इस प्रकार की इकाई सेलों में बिन्दु (अणु, परमाणु अथवा आयन), इकाई सेलों के केवल कोनों पर उपस्थित होते हैं।

(ii) पृष्ठ केन्द्रित इकाई सेल (Face Centred Unit Cell, fcc)

इसमें, इकाई सेल के कोनों तथा प्रत्येक पृष्ठ के केन्द्र पर एक बिन्दु स्थित होता है।

(iii) अन्तः केन्द्रित इकाई सेल (Body Centred Unit Cell, bcc)

इसमें, इकाई सेल के कोनों तथा सेल के अन्तः केन्द्र में एक-एक बिन्दु स्थित होता है।

जालक-बिन्दु (Lattice Point)

किसी इकाई सेल में परमाणुओं, अणुओं या आयनों को व्यक्त करने वाले बिन्दुओं को जालक-बिन्दु कहते हैं।

(a) इकाई सेल के कोनों पर स्थित बिन्दु का केवल –1/8 वाँ भाग ही एक इकाई सेल के लिए उत्तरदायी होता है।

(b) इकाई सेल के पृष्ठ के केन्द्रों पर स्थित बिन्दु का केवल 1/2 वाँ भाग ही एक इकाई सेल के लिए उत्तरदायी होता है।

(c) इकाई सेल के केन्द्र पर स्थित बिन्दु ऐसे बिन्दु पूर्ण रूप से इकाई सेल के अन्दर होते हैं, अत: पूर्णतया इकाई सेल के लिए उत्तरदायी होते हैं।

ठोसों के दोष (Imperfection of Solid in hindi)

ठोस के कण प्रबल आकर्षण बल द्वारा परस्पर बँधे रहते है। इनके क्रिस्टल में कणों की रिक्त के कारण दोष उत्पन्न हो जाते है। जिन्हें ठोसों(Solid state in hindi) के दोष कहते है। ये निम्न दो प्रकार के होते हैं।

(i) शॉटकी दोष (Schottky Defect)

समान संख्या में धनायन एवं ऋणायन का क्रिस्टल से गायब होना। यह घनत्व को कम करता है तथा चालकता को बढ़ाता है। यह दोष उन यौगिकों में पाया जाता है जहाँ उच्च समन्वय संख्या हो तथा धनायन एवं ऋणायन लगभग समान आकार के होते हैं। उदाहरण NaCl, KC1 आदि।

(ii) फ्रैंकल दोष (Frenkel Defect)

जब धनायन अपने मूल स्थान को छोड़कर अन्तराकाशी स्थान (interstitial space) में चला जाता है, तो उत्पन्न दोष को फ्रैंकल दोष कहा जाता है। इस प्रकार का दोष उन यौगिकों में पाया जाता है, जिनमें समन्वय संख्या निम्न होती है और धनायन का आकार ऋणायन की अपेक्षा छोटा होता है। उदाहरण ‘ ZnS, AgCl आदि।)

इस प्रकार के दोष में ठोस(Solid state in hindi) का घनत्व अपरिवर्तित रहता है। F-केन्द्र दोष के कारण क्रिस्टल जालक रंगीन प्रतीत होता है। इसमें धातु आयन अधिकता में होते हैं।

(iii) अशुद्धि दोष (Impurity Defect)

यह दोष-n तथा p प्रकार के अर्द्धचालक में महत्वपूर्ण है।

(a) n-प्रकार अर्द्धचालक (n-type semiconductor) 14 वर्ग के तत्व के साथ 15 वर्ग के तत्व मिलाये जाते हैं।
.(b) p-प्रकार अर्द्धचालक (p-type conductor) 14 वर्ग के के साथ 13 वर्ग के तत्व मिलाये जाते हैं।

ठोसों के वैधुत गुण(Electrical Properties of Solid in hindi)

Solid state in hindi-ठोसों में विद्युतीय गुण इलेक्ट्रॉनों अथवा धन छिद्रों की गति के द्वारा होता है। इलेक्ट्रॉनों की गति को इलेक्ट्रॉनिक चालकता तथा आयनों की गति को आयनिक चालकता कहते हैं।

आयनों अथवा धनात्मक छिदों में चालकता इलेक्ट्रॉनिक दोष के कारण होती है इलेक्ट्रॉनों में से चालन को n-प्रकार चालन तथा धन छिद्रों में से चालन को p- प्रकार चालन कहते हैं। शुद्ध आयनिक ठोस रोधी कहलाते हैं तथा इनमें चालन केवल आयनों की गति द्वारा होता है।

विद्युत चालकता के आधार पर ठोस तीन प्रकार के होते हैं-

सुचालक (Conductor)

सुचालक में विद्युत धारा का अधिकतम भाग प्रवाहित हो सकता है। इनकी विद्युत चालकता 10 ओम-1 सेमी-1 कोटि की होती है। उदाहरण धातुएँ।

अचालक (Non-conductor)

अचालक में प्रायोगिक रूप से विद्युत धारा का प्रवाह नहीं होता है तथा इनकी विद्युत चालकता की कोटि 10^-22 ओम^-1 सेमी^-1 होती है। उदाहरण-अधिकांश कार्बनिक (ग्रेफाइट को छोड़कर) तथा अकार्बनिक ठोस(Solid state in hindi)।

अर्द्ध-चालक (Semiconductor)

अर्द्ध-चालक की सामान्य ताप पर, विद्युत चालकता, सुचालक तथा अचालक के मध्य (10-9 से 102 ओम-1 सेमी-1 कोटि) होती है। परमशून्य ताप पर ये पूर्ण अचालक होते हैं, परन्तु कमरे के ताप पर कुछ विद्युत धारा प्रवाहित कर सकते हैं। उदाहरण Si, Ge आदि।

अर्द्ध-चालकों में कुछ अशुद्धि मिलाने पर इनकी चालकता बढ़ जाती है। यह प्रक्रम डॉपिंग कहलाता है।

डॉपिंग के आधार पर ये निम्न दो प्रकार के होते हैं-

(i) आन्तरिक अर्द्ध-चालक (Intrinsic Serniconductor)

ये आन्तरिक अर्द्ध-चालक तापीय दोषों के कारण बनते हैं। जीरो केल्विन (0 K) ताप पर, शुद्ध Ge या Si विद्युतरोधी होते हैं, क्योंकि सहसंयोजक बन्धों में उपस्थित इलेक्ट्रॉन चालन के लिए प्राप्त नहीं होते हैं।

उच्च तापों पर कुछ सहसंयोजक बन्ध टूट जाते हैं तथा इस प्रकार मुक्त इलेक्ट्रॉन गति करने के लिए मुक्त हो जाते हैं तथा विद्युत धारा प्रवाहित होती है। इस प्रकार का चालन आन्तरिक चालन कहलाता है।

(ii) बाह्य अर्द्ध-चालक (Extrinsic Semiconductor)

बाह्य अर्द्ध-चालक अशुद्धि दोष के कारण बनते हैं। Ge तथा Si, वर्ग 14 (IV A) के तत्व हैं। इनमें वर्ग 13 (III A) या 15 (V A) के तत्वों की कुछ अशुद्धि मिलाने पर इनकी चालकता अत्यधिक बढ़ जाती है। जब अर्द्ध-चालकों में वर्ग 15 (VA) के तत्वों की अशुद्धि मिलाई जाती है, तो
n-प्रकार के अर्द्ध चालक प्राप्त होते हैं।

इनमें विद्युत धारा का प्रवाह मुक्त इलेक्ट्रॉनों की गति के कारण होता है। परन्तु जब अर्द्ध-चालकों में वर्ग 13 (IIIA) के तत्त्वों की अशुद्धि मिलाई जाती है, तो के अर्द्ध-चालक प्राप्त होते हैं। इनमें विद्युत धारा का प्रवाह इलेक्ट्रॉन रिक्तियाँ (electron vacancies) अथवा धन कोटर (positive holes) के कारण होता है।

अति चालकता (Superconductivity)

इस प्रक्रम की खोज सर्वप्रथम 1913 में कैमरलिंग ओन्स ने की थी। उन्होंने पाया कि चार कैल्विन (4 K) ताप पर मर्करी (Hg) अति चालक हो जाता है। अति चालक (supercooled) वे पदार्थ हैं, जो परमताप (0-केल्विन) पर शून्य प्रतिरोधकता के साथ पूर्ण चालक हो जाते हैं।” और इनके इस गुण को अतिचालकता कहते हैं। जिस ताप पर कोई पदार्थ अति चालक की तरह व्यवहार करता है,संक्रमण ताप (transition temperature) कहलाता है।

अधिकांश धातुओं के लिए यह ताप 2K से 5K के मध्य होता है। कुछ संक्रमण धातु ऑक्साइडों (transition metal oxides) में अति चालकता का गुण, उच्च ताप पर पाया जाता है।

ठोसों के चुम्बकीय गुण(Magnetic Properties of Solids)

solid meaning in hindi-ठोस पदार्थों को चुम्बकीय क्षेत्र में इनके व्यवहार की प्रकृति के आधार पर निम्न प्रकार विभाजित किया जाता है।

1.अनुचुम्बकीय पदार्थ (Paramagnetic Substance)

वे पदार्थ, जो बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र की तरफ आकर्षित होते हैं, अनुचुम्बकीय पदार्थ कहलाते हैं। इन पदार्थों के परमाणुओं, अणुओं या आयनों में अयुग्मित (unpaired) इलेक्ट्रॉन उपस्थित होते हैं।

2.प्रतिचुम्बकीय पदार्थ (Diamagnetic Substance)

वे पदार्थ, जो बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र से प्रतिकर्षित होते हैं, प्रतिचुम्बकीय पदार्थ कहलाते हैं। इन पदार्थों के परमाणु, अणुओं या आयनों में सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित होते है।

3.लौह-चुम्बकीय पदार्थ (Ferro-magnetic Substance)

वे पदार्थ जो बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा तेजी से आकर्षित होते हैं, लौह-चुम्बकीय पदार्थ कहलाते हैं, इनमें सभी अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों का संरेखन (alignment) एक ही दिशा में होता है। ये पदार्थ स्थायी रूप से चुम्बकीय हो जाते हैं, अर्थात बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र की अनुपस्थिति में भी
चुम्बकत्त्व प्रदर्शित करते हैं।

(i) विपक्ष लौह-चुम्बकीय पदार्थ (Antiferro-magnetic Substance) जब बराबर संख्या के अयुग्मित इलेक्ट्रॉन विपरीत दिशा में संरेखित (aligned) होते हैं, तो उनके चुम्बकीय आघूर्ण (इलेक्ट्रॉन चक्रण) एक-दूसरे के चुम्बकीय आघूर्णों को निरस्त कर देते हैं। ऐसे पदार्थों को विपक्ष लौह-चुम्बकीय पदार्थ कहते हैं।

(ii) फैरी-चुम्बकीय पदार्थ (Ferri-magnetic Substance) जब अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की असमान संख्या विपरीत दिशा में संरेखित (aligned) होती है, तो परिणामी चुम्बकीय आघूर्ण शून्य नहीं होता है। ऐसे पदार्थों को फैरी-चुम्बकीय पदार्थ कहते हैं।उदाहरण Fe2O3

पैरा वैद्युत गुण (Dielectric Properties)

पैरा वैद्युत गुणों के आधार पर क्रिस्टल निम्न प्रकार के होते हैं।

(i) पीजो वैद्युत क्रिस्टल (Piezoelectric Crystal) ऐसे क्रिस्टल, जिनमें द्विधुव आघूर्ण रहता है और यान्त्रिक तनाव (mechanical stress) या दाब लगाने पर विकृति के फलस्वरूप विद्युत प्रवाहित होने लगती है, पीजो वैद्युती क्रिस्टल कहलाते हैं। इन क्रिस्टलों का उपयोग रिकार्ड प्लेयरों में किया जाता है।

(ii) पायरो वैद्युत क्रिस्टल (Pyroelectric Crystals) कुछ क्रिस्टलों को गर्म करने पर उनमें उपस्थित परमाणुओं या आयनों का व्यवस्थित क्रम विस्थापित हो जाता है और वैद्युत उत्पन्न होती है। इन क्रिस्टलों को पायरो वैद्युज क्रिस्टल कहते है। क्रिस्टलों के इस गुण को पायरो वैद्युता कहते हैं।

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