Male Reproductive System क्या है। पुरुष जननांग के बारे मे बेसिक जानकारी

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दोस्तों आज इस आर्टिकल में हम जानेंगे Male reproductive system के बारे। Male reproductive system क्या होता है। sperm कैसे बनते है। Male reproductive system का हिंदी मतलब क्या है।

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मनुष्य का प्रजनन तंत्र(Human Reproductive System)

मनुष्य एकलिंगी (unisexual) या एकलिंगाश्रयी (dioecious) प्राणी है। अर्थात, नर-जनन अंग (male reproductive organs) तथा मादा-जनन अंग (female reproductive organs) अलग-अलग व्यक्तियों में पाए जाते हैं। इन्हीं जनन अंगों के आधार पर मनुष्य पुरुष या नारी कहलाते हैं। दोनों प्रकार के जननांगों में सबसे प्रमुख रचना नर और मादा जनन(जनन-ग्रंथियाँ) या गोनड (gonad) होते हैं। इनके अतिरिक्त दोनों में कुछ सहायक लैंगिक अंग (accessory sex organs)तथा सहायक ग्रंथियाँ (accessory glands) भी पाए जाते हैं।

सारी रचनाएँ एकसाथ पुरुष में नर जननांग तथा स्त्री में मादा जननांग कहलाते हैं। मानव जननांग साधारणतः लगभग 12 वर्ष की में आयु में परिपक्व एवं क्रियाशील होने लगते हैं। इस अवस्था में बालक-बालिकाओं के शरीर में कुछ परिवर्तन होना प्रारंभ हो जाता है। यह अवस्था किशोरावस्था (adolescence) ने कहलाती है।

किशोरावस्था में होनेवाले कुछ परिवर्तन बालक एवं बालिकाओं में एकसमान होते हैं। जैसे काँख (armpit) एवं ने दोनों जंघाओं के बीच तथा बाह्य जननांग के समीप बाल आने लगते हैं। टाँगों तथा बाहुओं पर कोमल बाल उगने लगते हैं। त्वचा कुछ तैलीय (oily) होने लगती है। इस अवस्था में चेहरे पर फैंसियों (pimples) का निकलना भी प्रारंभ हो सकता है। इस अवस्था में अपने जैसे विपरीत लिंग वाले व्यक्तियों के प्रति आकर्षण उत्पन्न होने लगता है।

इन परिवर्तनों के अतिरिक्त किशोर बालक-बालिकाओं के शरीर में अलग-अलग प्रकार के कुछ परिवर्तन भी होने लगते हैं। जैसे, किशोर बालिकाओं के स्तनों में उभार आने लगता है। स्तन के केंद्र में स्थित स्तनाग्र (nipple) के चारों ओर की त्वचा का रंग ज्यादा गाढ़ा होने लगता है। मासिक चक्र प्रारंभ हो जाता है (मासिक चक्र की चर्चा इसी पाठ में आगे की गई है)।

किशोर बालक में मूंछ और दाढ़ी का उगना प्रारंभ होने लगता है। स्वरयंत्र या लैरिक्स के परिपक्वता के कारण आवाज में भारीपन आने लगता है। वृषण में नर युग्मक शुक्राणु बनने लगते हैं। नर-मैथुन अंग शिश्न (penis) के आकार में कुछ वृद्धि होने लगता है। मानसिक भावनाओं के प्रभाव से कभी-कभी शिश्न के आकार में सामान्य से ज्यादा अस्थायी वृद्धि तथा कठोरता आने लगती है।

किशोरावस्था में होनेवाले परिवर्तन की अवस्था यौवनारंभ या प्यूबर्टी (puberty) कहलाता है। प्यूबर्टी के समय शरीर में होनेवाले सभी परिवर्तन अंतःस्रावी ग्रंथियों द्वारा स्रावित हॉर्मोनों के प्रभाव से होते हैं।

नर-जनन अंग(Male Reproductive System)

नर-जननांग में दो वृषण (testes), कई शुक्र अपवाहिकाएँ (vasa efferentia), प्रत्येक वृषण से संबद्ध अधिवृषण या इपिडिडाइमिस (epididymis) एवं शुक्रवाहिनी (vas deferens), शुक्राशय (seminal vesicle), एक मूत्रमार्ग (urethra) तथा शिश्न (penis) एवं कुछ सहायक ग्रंथियाँ होती हैं।

वृषण (Testes)

वृषण पुरुष का सबसे प्रमुख जनन अंग है; क्योंकि नर युग्मक (male gamete) जो शुक्राणु (sperms) कहलाते हैं, इसी में बनते हैं। प्रत्येक पुरुष में दो अंडाकार वृषण होते हैं जो उदरगुहा के बाहर दोनों जंघाओं के बीच त्वचा तथा पेशियों से बनी एक थैली में स्थित होते हैं। इस थैली को वृषणकोष (scrotal sac or scrotum) कहते हैं।

प्रत्येक वृषण ऊपर से तंतुमय संयोजी ऊतक (fibrous connective tissue) के एक आवरण से ढंका होता है। प्रत्येक वृषण में कई कुंडलित नलिकाएँ पाई जाती हैं जिन्हें शुक्रजनन नलिकाएँ (seminiferous tubules) कहते हैं। इन्हीं नलिकाओं में शुक्राणुओं का विकास होता है। शुक्रजनन नलिकाएँ अंदर की ओर आपस में जुड़कर एक अत्यधिक कुंडलित नलिका बनाती हैं जो अधिवृषणवाहिनी (epididymis duct) कहलाती है।

अधिवृषण (Epididymis)

अधिवृषणवाहिनी एक लंबी नलिका है जो अत्यधिक कुंडलित और कसी हुई (compact) नलिका के रूप में वृषण के भीतरी किनारे से चिपकी होती है। इस रचना को अधिवृषण या एपिडिडाइमिस कहते हैं। अधिवृषण से एक शुक्रवाहिका (vas deferens) नामक नलिका निकलती है। अधिवृषण शुक्राणुओं का संग्रह स्थान है। इसी भाग में शुक्राणु परिपक्व (mature) तथा सक्रिय होकर निषेचन (fertilization) के योग्य बनते हैं।

शुक्रवाहिका

यह करीब 25 cm लंबी नलिका है। इसकी दीवार मांसल और संकुंचनशील (contractile) होती है। दोनों शुक्रवाहिकाएँ (vasa differentia) वृषण के पीछे से इनके समानांतर आगे बढ़ती हैं तथा आगे यह मूत्राशय (urinary bladder) तक जाती हैं। मूत्राशय के समीप ये अपनी ओर की मूत्रनली (ureter) पर एक फंदा (loop) बनाकर मूत्राशय के पृष्ठतल पर पहुँच जाती हैं। यहाँ से ये कुछ नीचे आती हैं, फिर अपनी ओर की शुक्राशय (seminal vesicle) की नलिका से जुड़कर एक स्खलन नली (ejaculatory duct) का निर्माण करती हैं।

स्खलन नली

ये दो छोटी नलिकाएँ हैं जो शुक्रवाहिका तथा शुक्राशय की नलिका के जुड़ने से बनती हैं। दोनों स्खलन नलियाँ एक पुरःस्थ ग्रंथि (prostate gland) में प्रवेश कर जाती हैं। पुरःस्थ ग्रंथि में दोनों नलियाँ मूत्राशय से आनेवाली नली के साथ जुड़कर मूत्रमार्ग (urethra) का निर्माण करती हैं।

मूत्रमार्ग

यह एक लंबी, मांसल नली है। इसमें दो सहायक ग्रंथियाँ–पुर:स्थ ग्रंथि (prostate gland) तथा काउपर ग्रंथि(Cowper’s gland) की नलिकाएँ भी खुलती हैं। इसके बाद मूत्रमार्ग नीचे की ओर बढ़ता है और शिश्न (penis) के मध्य से होता हुआ शिश्न के सिरे पर मूत्र-जनन छिद्र द्वारा बाहर खुल जाता है। मूत्रमार्ग से होकर मूत्र तथा वीर्य (semen) दोनों बाहर निकलते हैं।

पुर:स्थ ग्रंथि (Prostate gland)

यह मूत्राशय के आधार पर स्थित एक छोटी, लगभग गोलाकार ग्रंथि है। यह दाएँ और बाएँ पिंड (right and left lobes) का बना होता है। दोनों पिंड एक-दूसरे से बिलकुल सटे हुए मध्य में जुड़े होते हैं। मूत्रमार्ग पुर:स्थ ग्रंथि के बीच से होकर गुजरता है। मूत्रमार्ग के इसी भाग में पुरःस्थ नलिकाएँ (prostatic ducts) खुलती हैं। पुर:स्थ ग्रंथि से पुर:स्थ द्रव (prostatic fluid) स्रावित होता है। पुर:स्थ द्रव, शुक्राणु द्रव (spermatic fluid) तथा शुक्राशय द्रव (seminal fluid) मिलकर वीर्य (semen) बनाते हैं। पुर:स्थ द्रव के कारण ही वीर्य में विशेष गंध होती है। पुर:स्थ द्रव वीर्य के शुक्राणुओं (नर युग्मक) को उत्तेजित करता है।

काउपर ग्रंथि (Cowper’s gland or bulbourethral gland)-

पुर:स्थ ग्रंथि के ठीक नीचे एक जोड़ी छोटी काउपर की ग्रंथियाँ होती हैं। इन ग्रंथियों की नलिकाएँ मूत्रमार्ग में खुलती हैं। यह ग्रंथि एक क्षारीय द्रव स्रावित करती है जो मूत्रमार्ग की दीवार को मूत्र के द्वारा उत्पन्न खुजलाहट और जलन से बचाता है। मैथुन (copulation) के समय यह द्रव मादा की योनि की अम्लीयता को नष्ट करता है तथा शुक्राणुओं को सुरक्षित रखने में सहयोग करता है।

शिश्न (Penis)

यह एक मांसल, बेलनाकार रचना है जो पुरुष का मैथुन अंग (copulatory organ) है। यह वृषणकोष के सामने बीचोबीच स्थित होता है। यह बाहर से एक ढीली त्वचा से ढंका होता है। शिश्न का शिखर भाग ग्लांस (glans) कहलाता है। ग्लांस के ऊपर त्वचा का एक ढीला आवरण
प्रिप्यूस (prepuce) कहलाता है।

शिश्न के ठीक बीच से मूत्रमार्ग आगे की ओर जाता है तथा अंत में शिश्न के शिखर पर एक मूत्र-जनन छिद्र के द्वारा बाहर खुल जाता है। शिश्न का कार्य निषेचन (fertilization) के लिए शुक्राणुओं को स्त्री की योनि में पहुँचाना है। शुक्राणु सूक्ष्म, सक्रिय, एकगुण कोशिकाएँ (haploid cells) हैं जिनका विकास वृषण की शुक्रजनन नलिकाओं में होता है। ये नर युग्मक (male gametes) हैं।

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