विद्युत बल्ब के बारे मे बेसिक जानकारी -Bulb in hindi

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विद्युत बल्ब(Bulb in hindi)विज्ञान के महानतम अविष्कारों में से एक है। इस अविष्कार ने हमारी पूरी दुनिया ही बदल दी। शुरुआती दिनों मे जब एडिसन ने विद्युत बल्ब का अविष्कार किया था। तब लोग उन्हें जादूगर समझते थे। इसके बाद विज्ञान मे एक से बढ़कर एक अविष्कार हुए। आज के इस आर्टिकल मे हम विद्युत बल्ब के बारे मे जानेगे।

विद्युत बल्ब (Electric bulb in hindi)

विद्युत बल्ब (About Bulb in hindi)का आविष्कार सर्वप्रथम् एडीसन ने किया था। इसमें टंगस्टन धातु का एक पतला कुण्डलीनुमा तन्तु लगा होता है। इस धातु का आक्सीकरण रोकने के लिये बल्ब के अन्दर निर्वात् कर दिया जाता है ।

इसका आवरण पतले काँच का बना होता है। कभी-कभी बल्ब के अन्दर पूर्णतः निर्वात् करने की बजाय उसमें आर्गन या नाइट्रोजन जैसी कोई अक्रिय गैस भर देते हैं। टंगस्टन धातु का प्रयोग इसलिये किया जाता है, क्योंकि इसका गलनाँक अत्यधिक(लगभग 3500°C) होता है। तन्तु में धारा प्रवाहित होने पर उसका ताप 1500°C से 2500°C तक हो जाता है।

इस ताप पर तन्तु प्रकाश देने लगता है। इस प्रकार के बल्बों(Bulb in hindi) में व्यय ऊर्जा का 5 से 10% भाग ही प्रकाश में परिवर्तित होता है। शेष ऊर्जा ऊष्मा में रूपान्तरित होकर बल्ब से बाहर निकल जाती है।

बल्ब में अक्रिय गैस इसलिये भरते हैं, क्योंकि निर्वात् में उच्चताप पर टंगस्टन धातु का वाष्पीकरण हो जाता है तथा यह वाष्पीकृत होकर बल्ब की दीवारों पर चिपक जाता है। इसे ‘ब्लैकनिंग’ (Blackening) कहते है। इस प्रक्रिया के बाद तन्तु कमजोर होकर है

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घर मे प्रयोग में लाये जाने वाले बल्ब 220 वोल्ट पर जलते हैं । रेलगाड़ियों में लगे बल्ब 24 वोल्ट पर, ट्रैक्टरों व मोटर साइकिल में 12 वोल्ट पर एवं टार्च में 1.5 वोल्ट पर।

ट्यूब लाइट (Tube light bulb in hindi )

कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं कि जब उन पर ऊँची आवृत्ति का प्रकाश जैसेपराबैंगनी प्रकाश डाला जाता है तो वे उसे अवशोषित कर लेते हैं तथा नीची आवृत्ति के प्रकाश का उत्सर्जन करते हैं। ऐसे पदार्थ फास्फर कहलाते हैं तथा इस घटना को प्रतिदीप्ति (Fluorescence) कहते हैं ।

ट्यूब लाइट में काँच की एक लम्बी ट्यूब(About Bulb in hindi) होती है, जिसके अन्दर की दीवारों पर फास्फर का लेप चढ़ा रहता है। ट्यूब के अन्दर अक्रिय गैस जैसे ऑर्गन को कुछ पारे के साथ भर देते है। tube के दोनों किनारों पर बेरियम ऑक्साइड की परत चढ़ी हुई रहती है।

और दोनों तरफ टंगस्टन के दो तंतु लगे होते हैं। जब तंतुओ में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती हैं।

तो इनसे इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होते हैं जो ट्यूब में भरी गैस का आयनीकरण करते है। आयनीकरण से उत्पन्न आयनों के प्रवाह के फलस्वरूप ट्यूब में धारा बहने लगती है। ट्यूब में स्थित पारा गर्मी पाकर वाष्पित होता है तथा इससे विद्युत विर्सजन के कारण पराबैंगनी किरणें उत्पन्न होती हैं।

जब ये किरणें ट्यूब की दीवारों पर पुते फास्फर पर पड़ती हैं तो वह उन्हें अवशोषित करके निचली आवृत्ति के प्रकाश का उत्सर्जन करता है। ट्यूब में फास्फर इस प्रकार का लिया जाता है कि उससे उत्पन्न प्रकाश सूर्य के प्रकाश जैसा दिखायी देता है।

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इसमें व्यय ऊर्जा का अधिकांश भाग (60 से 70%) प्रकाश के रूप में प्राप्त होता है। उदाहरण के लिए 40 वाट का बल्ब और इसी वाट की ट्यूब लाइट जलाने पर बल्ब (Bulb in hindi)की तुलना में ट्यूब लाइट 6 से 8 गुना अधिक प्रकाश देगी। ट्यूब लाइट की आयु बल्ब की तुलना में कई गुना अधिक होती है।

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