RNA का फुल फॉर्म क्या है, RNA क्या है (About RNA full form information)

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हेलो दोस्तों नमस्कार आज इस आर्टिकल में हम जानेंगे RNA क्या होता है, RNA का full form क्या होता है। RNA के अंदर क्या होता है। RNA कैसे बनता है। अगर आपको RNA के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। तो आप सही जगह आए हैं। आर्टिकल के अंत तक आपको RNA से जुड़ी बेसिक जानकारी मिल जाएगी।

RNA का फुल फॉर्म-Ribonucleic Acid

RNA क्या है

RNA का फुल फॉर्म Ribonucleic acid होता है। RNA एक तरह का अनुवांशिक पदार्थ होता है। यह चार अलग-अलग रासायनिक पदार्थ एडिनीन, ग्वानिन, थाइमिन तथा युरोसिल से मिलकर बनता है।

RNA का निर्माण (Transcription)

DNA से ही RNA का संश्लेषण होता है। इस क्रिया में DNA की एक श्रृंखला पर RNA की न्यूक्लियोटाइड आकर जुड़ जाती है। इस प्रकार एक अस्थाई DNA-RNA संकर का निर्माण होता है। इसमें नाइट्रोजन बेस थायमिन के स्थान पर यूरेसिल होता है। कुछ समय बाद RNA की समजात शृंखला अलग हो जाती है।

RNA तीन प्रकार के होते हैं-

(i) r-RNA (Ribosomal RNA)—ये राइबोसोम पर लगे रहते हैं और प्रोटीन संश्लेषण में सहायता करते हैं।

(ii) t-RNA (Transfer RNA)—यह प्रोटीन संश्लेषण में विभिन्न प्रकार के अमीनों अम्लों को राइबोसोम पर लाते हैं, जहाँ पर प्रोटीन बनता है।
नोट : प्रोटीन बनने की अंतिम क्रिया को ट्रान्सलेशन (Translation) कहते हैं।

(iii) m-RNA (Messenger RNA) केन्द्रक के बाहर विभिन्न आदेश लेकर अमीनों अम्लों को चुनने में मदद करता है।

RNA और DNA मे अंतर

रिबोन्यूक्लिक एसिड (Ribonucleic Acid-RNA)—यह अम्ल भी अधिक अणुभार वाली पाली- यूक्लियोटाइड (polynucleotide) है । यह डी० एन० ए० निम्न प्रकार से भिन्न होता है-

(i) इसमें शर्करा राइबोज होती है जबकि डी० एन० ए० में डीआक्सीराइबोज शर्करा होती है।
(ii) इसमें थाइमीन के स्थान पर यूरेसिल आ जाता है।
(iii) ये एक लम्बी श्रृंखला में होते हैं।

DNA का द्विगुणन (Replication of DNA)

किसी DNA अणु से उसी प्रकार के DNA अणु के निर्माण को DNA का द्विगुणन कहते हैं। द्विगुणन के दौरान DNA द्वि-कुण्डल की दोनों शृंखलाएं एक सिरे से आरम्भ होकर क्रमिक रूप से H-बन्धनों के ढीला पड़ने से एक-दूसरे से अलग हटती जाती है। अलग हुए प्रत्येक श्रृंखलाये बेसों के सामने अपने-अपने पूरक बेसों को आकर्षित करती हैं।

जेनेटिक कोड प्रोटीन का संश्लेषण कोशिका के राइबोसोम पर होता है। कोशाद्रव्य में उपस्थित 20 अमीनो अम्लों का सही चुनाव जेनेटिक कोड से ही संभव है। प्रोटीन में अमीनों अम्लों के क्रम को निर्धारित करने का संदेश संदेशवाहक RNA(m-RNA) के बेस क्रम पर निर्भर करता है जोकि DNA से बनता है। नीरेनबर्ग और मथाई ने 1964 में सर्वप्रथम आनुवंशिक कोड का आधार बताया। बाद में राबर्टहाले और भारतीय मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक डा. हरि गोविन्द खुराना ने सम्पूर्ण जेनेटिक कोड का पता लगाया तथा इस कार्य के लिए उन्हें 1968 में नोबुल पुरस्कार दिया गया। इनके अनुसार कुल 64 बेसत्रिक कोड (triplet code) होते हैं।

प्रत्येक अमीनो एसिड के लिए एक या एक से अधिक कोड आवश्यक होते हैं। कोड कामाविहीन होता है। यह कोड सभी जीवों के लिए समान होता है। प्रारम्भी कोड AUG होता है जो अमीनो अम्ल मेथियोनिन के लिए कोड करता है । प्रोटीन संश्लेषण बन्द करने के लिए तीन कोड UAA, UAG तथा UGA होते हैं जिन्हें नानसेन्स कोडान (Non-sense codon) कहते हैं।

परिवर्तन तथा उत्परिवर्तन (Variation and Mutation)वातावरण या आनुवंशिक कारणों से जीनोटाइप या फीनोटाइप में जो परिवर्तन होते हैं वे नई जातियों के विकास के लिए उपयोगी हैं। डार्विन ने इसे परिवर्तन कहा जबकि ह्यगो डी वीज (Hugo de Vries) ने इसे उत्परिवर्तन (Mutation) कहा । उत्परिवर्तन ऐसे असतत आनुवंशिक परिवर्तन होते हैं। जो अचानक उत्पन्न होते हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनका स्थानान्तरण होता रहता है ।

म्यूटेसन मुख्य रूप से तीन प्रकार का होता है-

(क) गुणसूत्र-उत्परिवर्तन (Chromosomal-mutation)—इसे गुणसूत्र-विपथन (Chromosomal aberration) भी कहते हैं। इसमें गुणसूत्रों में जीनों की क्रम-व्यवस्थता बदल जाती है। यह चार तरह का होता है-न्यूनता,द्विगुणन, स्थानान्तरण तथा व्युतक्रमण।

(ख) जीन-उत्परिवर्तन (Gene Mutation)- इसमें डी. एन. ए. की संरचना व बेस क्रम में परिवर्तन हो जाता है।इसमें बेस जोड़े का प्रकार बदल जाता है। एक प्यूरिन बेस दूसरेप्यूरिन बेस द्वारा तथा एक पिरीमिडीन बेस दूसरे पिरीमिडीन बेस के स्थान पर आ जाता है।

(ग) जीनोम-उत्परिवर्तन(Genome-Mutation)-इसमें एक या एक से अधिक सूत्रों का पूरा अगुणित समूह जो जीनोम कहलाता है उसकी संख्या अधिक या कम हो जाती है। यह दो प्रकार का होता है-विषमगुणितता तथा सत्यगुणितता।