पायस क्या होता है, परिभाषा, प्रकार, उपयोग,बनाने की विधी(What is Emulsions ,definition,benefits)

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पायस (Emulsions)

पायस क्या है ? जब एक द्रव दूसरे द्रव में श्लेषाभीय स्थिति (Colloidal State) में वितरित रहता है, तो ऐसे घोल को पायस (Emulsion) कहा जाता है।

दो अमिश्रणीय (Inmmiscible) द्रवों को मिलाकर पायस बनाया जा सकता है । साधारणत: दो द्रवों में से एक जल ही रहता है। इनमें से एक द्रव जो कम मात्रा में उपस्थित रहता है उसे विच्छिन्न (Dispersed) पदार्थ कहा जाता है और दूसरा द्रव जो अधिक मात्रा में उपस्थित रहता है उसे विच्छिन्नकारक माध्यम (Dispersion medium) कहा जाता है।

श्लेषाभीय घोलों(Colloidal solutions) की भाँति पायस में भी विच्छिन्न पदार्थ असतत् (Discontinuous) होता है, किन्तु विच्छिन्नकारक माध्यम सतत् होता है।

पायस के प्रकार (Types of Emulsions)

पायस दो प्रकार के होते हैं-(i) तेल-जलीय पायस (Oil in water emulsion) तथा (ii) जल-तैलीय पायस (Water in oil emulsion)

(i) तेल-जलीय पायस (Oil in water emulsion)

तेल जलीय पायस वह है जिसमें तेल की मात्रा कम किन्तु जल की मात्रा अधिक रहती है। जल तैलीय पायस वह है जिसमें जल की मात्रा कम, किन्तु तेल की मात्रा अधिक रहती है।

पायस बनाने की विधि-

पायस तैयार करने की विधि बहुत ही सहज है। जिन द्रवों से पायस तैयार करना है, उनकी उचित मात्रा लेकर खूब अच्छी तरह मिश्रित किया जाता है । इस प्रकार मिश्रित करने पर पायस तैयार हो जाता है जो अस्थायी होता है। अस्थायी पायस से स्थायी पायस बनाने के लिए इसमें पायसीकारक पदार्थ (Emulsifying agent) मिला दिये जाते हैं।

जिलेटिन,गोंद, साबुन इत्यादि पायसीकारक पदार्थ हैं। ये सभी विलायक प्रिय श्लेषाभ (Colloid) होते हैं। वास्तविकता यह है कि पायसीकरण (Emulsification) में ये पदार्थ विच्छिन्न द्रव (Dispersed liquid) के कणों पर तह का निर्माण करते हैं जिनसे ये कण विलायक-प्रिय श्लेषाभ की भाँति व्यवहार करने लगते हैं। इसी कारण इनकी उपस्थिति में पायस स्थायित्व की प्राप्ति करता है।

पायस के गुण–

पायस के निम्नलिखित गुण हैं-

(i) पायस में श्लेषाभीय घोलों के करीब-करीब सभी गुण विद्यमान रहते हैं ।
(ii) कोलॉइड के कणों की भाँति विद्युत-क्षेत्र में पायस के कण भी विद्युतोदों (Electrodes) की ओर गमन करने लगते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि पायस के कणों पर भी विद्युत आवेश रहता है
(iii) अस्थायी पायस में पायसीकारक मिलाने पर यह स्थायित्व की प्राप्ति कर लेता है।
(iv) विच्छिन्नकारक माध्यम को पायस में मिलाने पर यह तुरन्त मिलकर पूरे घोल को तुन (dilute) कर देता है, किन्तु विच्छिन्न पदार्थों को पायस अपने में नहीं मिला सकता है।

इस गुण का उपयोग किसी दिए गए पायस में कौन विच्छिन्न कारक माध्यम है और कौन विच्छिन्न पदार्थ यह जानने के लिए किया जा सकता है। एक पायस को अलग-अलग दो परखनली में लें । अब पायस के एक अवयव को एक परखनली में तथा दूसरे अवयव को दूसरे परखनली में और इसे अच्छी तरह मिश्रित करें। जो अवयव पायस में पूरी तरह मिश्रित हो जायेगा वही विच्छिनकारक माध्यम होगा और दूसरा अवयव जो नहीं मिश्रित होगा वह विच्छिन्न पदार्थ कहलायेगा।

इस प्रकार की जाँच एक रंगीन पदार्थ से भी की जा सकती है। यदि पायस का एक अवयव जल हो और जल विच्छिन्नकारक माध्यम है और तेल विच्छिन्न पदार्थ है तो ऐसी स्थिति में रंग डालने पर सम्पूर्ण पायस रंगीन हो जाएगा। याद रहे कि रंग जल में घुलनशील किन्तु तेल में अघुलनशील है। किन्तु जब इसी पायस में एक ऐसा रंग डाला जाता है जो तेल में घुलनशील और जल में अघुलनशील हो तो पायस की सतत् प्रावस्था (continuous phase) रंगहीन ही रहती है ।

पायस का उपयोग

कोलॉइड घोलों की भाँति पायस का भी दवा के रूप में उपयोग होता है। इनमें कॉड लीवर का तेल (Cod-lever
oil) तथा हेलीबेट लीवर का तेल (Halibut liver oil) मुख्य है।

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